उज्जैन में कागज की लुगदी से बनने वाले पक्षी कई चरणों के काम का नतीजा हैं। कागज भिगोना, उसे मसलना, लुगदी सुखाना, साँचे में आकार देना और आखिर में रंग भरना—हर चरण अगला काम संभव बनाता है। मध्यप्रदेश पर्यटन के 1 दिसंबर 2020 के शिल्प-विवरण में इस प्रक्रिया के साथ पक्षियों को आकार देने की खास बारीकियाँ दर्ज हैं।
सूखी लुगदी फिर काम आती है
इस शिल्प को पेपर माशे कहा जाता है। बेकार कागज कई दिनों तक पानी में रखा जाता है। नरम होने पर उसे मसलकर लुगदी बनाई जाती है, जिसे सुखा लिया जाता है। सूखी लुगदी तत्काल काम में ली जा सकती है या बाद के लिए रखी जा सकती है।
आकार बनाने के समय यही लुगदी दोबारा पानी में भिगोई जाती है। उसमें गोंद और चॉक पाउडर मिलाकर गूँथने योग्य मिश्रण तैयार होता है। कारीगर इसे मोटी चादर जैसा फैलाकर प्लास्टर ऑफ पेरिस के साँचों में रखते हैं। धूप में सूखने के बाद निकले आकार की सतह रेगमाल से चिकनी की जाती है।
पंखों की बारीकी रंग में
तैयार सतह पर चित्रकारी का चरण शुरू होता है। पर्यटन विभाग के विवरण में पक्षियों के शारीरिक आकार, बैठने की मुद्रा, पंखों के ब्योरे और रंगों के क्रमिक बदलाव पर ध्यान देने का उल्लेख है। इस तरह एक ही आधार सामग्री से बनी आकृतियाँ अलग-अलग पक्षियों का रूप लेती हैं।
इस काम में पशुओं के मुखौटे और देव प्रतिमाएँ भी बनाई जाती हैं, लेकिन विवरण पक्षी-आकृतियों को खास स्थान देता है। साँचा मूल आकार बनाता है; उसकी सतह पर पंख, रंग और भाव उभारने का काम उसके बाद होता है।
मुख्य बातें
- भीगे कागज की लुगदी को सुखाकर आगे के काम के लिए रखा जा सकता है।
- लुगदी, गोंद और चॉक पाउडर का मिश्रण प्लास्टर ऑफ पेरिस के साँचों में आकार लेता है।
- धूप में सूखे आकार को चिकना करने के बाद रंग और पंखों के ब्योरे बनाए जाते हैं।
स्रोत और संदर्भ
सार्वजनिक प्राथमिक स्रोतों पर आधारित संपादित लेख। स्रोत जाँच: 16 सितंबर 2026।



